Your Poems

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जिंदगी सवारने की चाहत में, हम इतने मशगूल हो गए... चंद सिक्कों से तो रूबरू हुए, पर ज़िन्दगी से दूर हो गए.

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सितम देखो कि जो खोटा नहीं है चलन में बस वही सिक्का नहीं है नमक ज़ख्मों पे अब मलता नहीं है ये लगता है वो अब मेरा...

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तीरगी से रौशनी का हो गया मैं मुक़म्मल शायरी का हो गया देर तक भटका मैं उसके शह्र में और फिर उसकी गली का हो गया, सो गया...

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ख़ला को छू के आना चाहता हूँ मैं ख़ुद को आज़माना चाहता हूँ मेरी ख़्वाहिश तुझे पाना नहीं है ज़रा सा हक़ जताना चाहता हूँ तुझे ये जान...

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रो-धो के सब कुछ अच्छा हो जाता है मन जैसे रुठा बच्चा हो जाता है कितना गहरा लगता है ग़म का सागर अश्क बहा लूं तो उथला...

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वो मिरे सीने से आख़िर आ लगा मर न जाऊं मैं कहीं ऐसा लगा रेत माज़ी की मेरी आँखों में थी सब्ज़ जंगल भी मुझे सहरा लगा खो...