Meri Bhav Badha Haro-बिहारी सतसई

Meri Bhav Badha Haro-बिहारी सतसई

0 510

मेरी भव-बाधा हरौ राधा नागरि सोई l
जा तन की झाईं परै श्यामु हरित दुति होई ll

भव-बाधा = संसार के कष्ट, जन्ममरण का दु:ख
नागरि = सुचतुरा
झाईं = छाया
हरित = हरी
दुति = द्युति, चमक

वही चतुरी राधिका मेरी सांसारिक बाधाएँ हरें-नष्ट करें, जिनके (गोरे) शरीर की छाया पड़ने से (साँवले) कृष्ण की द्युति हरी हो जाती है l