Ro-Dho Ke Sab Achcha Ho Jata: a Ghazal by ‘Kaanha’

Ro-Dho Ke Sab Achcha Ho Jata: a Ghazal by ‘Kaanha’

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रो-धो के सब कुछ अच्छा हो जाता है
मन जैसे रुठा बच्चा हो जाता है

कितना गहरा लगता है ग़म का सागर
अश्क बहा लूं तो उथला हो जाता है

लोगों को बस याद रहेगा ताजमहल
छप्पर वाला घर क़िस्सा हो जाता है

मिट जाती है मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू
कहने को तो, घर पक्का हो जाता है

नीँद के ख़ाब खुली आँखों से जब देखूँ
दिल का इक कोना ग़ुस्सा हो जाता है

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